प्रकृति पर्व सरहुल आदिवासियों का वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला है एक प्रमुख पर्व : अजय तिर्की

 The Dainik Aawaz News Ranchi: 
प्रकृति पर्व सरहुल आदिवासियों का वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला है एक प्रमुख पर्व है।


 पतझड़ के बाद पेड़-पौधे की टहनियों पर हरी-हरी पत्तियां जब निकलने लगती है, आम के मंजर तथा सखुआ और महुआ के फुल से जब पूरा वातावरण सुगंधित हो जाता है। 


तब मनाया जाता है आदिवासियों का प्रमुख “प्रकृति पर्व सरहुल“। यह पर्व प्रत्येक वर्ष चैत्र शुक्ल पक्ष के तृतीय से शुरू होकर चैत्र पूर्णिमा के दिन संपन्न होता है। इस पर्व में “साल अर्थात सखुआ” के वृक्ष का विशेष महत्व है।



 आदिवासियों की परंपरा के अनुसार इस पर्व के बाद ही नई फसल (रबि) विशेषकर गेहूं की कटाई आरंभ की जाती है। इसी पर्व के साथ आदिवासियों का शुरू होता है “नव वर्ष।।


           सरहुल दो शब्दों से मिलकर बना है ‘सर’ और ‘हुल’ । यहां सर का अर्थ ‘सरई‘ अर्थात सखुआ (साल पेंड़) के “फूल/फल” से होता है। जबकि हुल का अर्थ ‘क्रांति’ से है। इस प्रकार सखुआ के फूलों की क्रांति को “सरहुल” के नाम से जाना जाता है।


       प्रकृति पर्व सरहुल वसंत ऋतु में मनाए जाने वाला आदिवासियों का प्रमुख त्यौहार है। वसंत ऋतु में जब पेड़ ‘पतझड़‘ में अपनी पुरानी पतियों को गिरा कर टहनियों पर नई-नई पत्तियां लाने लगती है, तब सरहुल का पर्व मनाया जाता है।

 यह पर्व मुख्यतः चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के तृतीय से शुरू होता है और चैत्र पूर्णिमा को समाप्त होता है। अंग्रेजी माह के अनुसार यह पर्व अप्रैल में मुख्य रूप से मनाया जाता है। कभी-कभी यह पर्व मार्च के अंतिम सप्ताह में भी आता है। 2023 में 24 मार्च, दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा।
अजय तिर्की
अध्यक्ष
केन्द्रीय सरना समिति, झारखण्ड प्रदेश।।

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