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भक्ति के गूढ़ रहस्य
भगवान तक पहुंचाने वाली चाबी
आनंद चाहना गलत बात नहीं है बशर्ते हमारा मार्ग सही हो। अभी तो हम संसार में आनंद खोज रहे हैं। उदहारण के तौर पर हमारा मन कहता है कि हमें रसगुल्ला खाकर सुख मिलेगा। हमने बात मानकर रसगुल्ला खाया, एक खाया अच्छा लगा, दूसरा खाया सुख कम, तीसरा खाया सुख और कम हुआ, चौथा खाया हमारा मन ऊब गया और पाँचवा खाया उल्टी हो गई।
तो हमें यह समझना होगा कि संसार का सुख क्षणिक है और सीमित है। हमें तो सीमित नहीं अनंत मात्रा का आनंद चाहिए वह भी सदा के लिए। इसीलिए हमें सही दिशा में भगवान की दिशा में जाना होगा। लेकिन हम अपनी मायिक इंद्रिय, मन और बुद्धि से भगवान को नहीं समझ सकते, उनके पास जाने का सवाल ही नहीं उठता। उसके लिए वेद हमें एक सच्चे गुरु की शरण में जाने की सलाह देते हैं।
पर गुरु की कृपा होना भगवान की बड़ी दुर्लब कृपा है। इसपर 'रामायण' कहती है 'बिनु हरि कृपा मिलहि नहीं संता।' भगवान ही अपनी उपाधि 'अकारण करुण' की वजह से जीव पर गुरु की कृपा कर देते हैं। तब गुरु जीव को तत्वज्ञान देता है।
अत्यंत स्पस्ट भाव से स्वामी जी ने समझाया कि भगवान कैसे मिलेंगे। स्वामी जी ने पूरी लिंक बता दी भगवद कृपा की। "भगवान कैसे मिलेंगे जब भगवान कृपा करेंगे। कृपा कैसे मिलेगी, जब भगवद ज्ञान होगा। और ज्ञान कैसे मिलेगा, जब हमें श्रद्धा होगी।" हमें उस परात्पर तत्व से कृपा के लिए याचना करनी पड़ेगी और उसके लिए प्रतीक्षा करनी होगी। ऐसा नहीं सोचना है कि भगवान हमें भूल गए, वह सब पर कृपा कर रहे हैं, हमें छोड़ दिए हैं। नहीं, गलती हमारी तरफ से है, कमी हमारी है "तेरे कर्म में कमी नहीं है, तू करीम है, झूठा अधिकारी हूँ मैं।"
जब आप गुरु के बताए तत्वज्ञान के द्वारा साधना करना आरंभ करेंगे और भगवान की शरण में जाएँगे, तब आपकी भगवत्प्राप्ति निश्चित है। शरणागति के ६ अंग बताए गए हैं, जो अकाट्य हैं।
१ भगवान की इच्छा में इच्छा रखना
२ भगवान की इच्छा के विरुद्ध इच्छा न रखना
३ भगवान हमारी रक्षा कर रहे हैं, इसपर पूर्ण भरोसा रखना
४ भगवान के प्रति कृतज्ञता का भाव रखना।
५ जो भी वस्तु आपके पास हैं, उसे अपनी नहीं ईश्वर की ही मानना
६ शरणागति करने का अहँकार न करना कि मैंने शरणागति कर ली।
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