आंदोलनकारी संघर्ष मोर्चा की बैठक में मान सम्मान व 5% आरक्षण का मांग

झारखंड आंदोलनकारी संघर्ष मोर्चा की महत्वपूर्ण बैठक टंडवा में संपन्न
मान–सम्मान, पेंशन एवं 5% आरक्षण की मांग हुई तेज



टंडवा। झारखंड आंदोलनकारी संघर्ष मोर्चा की एक महत्वपूर्ण बैठक शुक्रवार को टंडवा टाउन हॉल में संपन्न हुई। बैठक की अध्यक्षता राम नरेश राणा ने की, जबकि संचालन का दायित्व बचरा की मीना कुमारी ने निभाया। कार्यक्रम में चतरा जिला अध्यक्ष कैलाश सिंह एवं जिला सचिव सुगन साव मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। बैठक में जिले भर से आए आंदोलनकारियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और झारखंड आंदोलन की विरासत, सम्मान तथा अधिकारों पर व्यापक चर्चा की।


बैठक में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया गया कि झारखंड आंदोलनकारी को मान–सम्मान, अलग पहचान एवं 50 हजार रुपये मासिक पेंशन दिया जाए। वक्ताओं ने कहा कि जिन आंदोलनकारियों ने राज्य अलग बनाने के संघर्ष में अपना जीवन, समय और ऊर्जा लगाई, आज वही लोग सम्मान और सुरक्षा से वंचित हैं। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह आंदोलनकारियों के योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें स्थायी आर्थिक सुरक्षा उपलब्ध कराए।


साथ ही, आंदोलनकारियों ने सरकार से सरकारी सेवा बहाली में 5% आरक्षण दिए जाने की भी जोरदार मांग की। वक्ताओं का कहना था कि झारखंड बनने में आंदोलनकारियों की निर्णायक भूमिका रही है, इसलिए उन्हें नौकरी में प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

बैठक में आंदोलनकारियों ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो जनवरी माह में मुख्यमंत्री आवास घेराव किया जाएगा। आंदोलनकारियों ने कहा कि वर्षों से केवल आश्वासन मिलता रहा है, अब समय है कि सरकार ठोस कदम उठाए।

बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि चतरा जिला में झारखंड आंदोलनकारी संघर्ष मोर्चा का सदस्यता अभियान व्यापक स्तर पर चलाया जाएगा, ताकि अधिक से अधिक आंदोलनकारी संगठन से जुड़ सकें और अपनी आवाज बुलंद कर सकें।

बैठक में जिला उपाध्यक्ष संतोष नायक, रविंद्र बक्शी, मुनेश्वर माली, संतोष साव, जीतन महतो, सुरेश महतो, बिहार नायक, जोगिंदर नायक, अनिल सोनी, माथुर साव, प्रकाश पासवान, रामविलास सोनी, रामेश्वर राम, ज्ञानी महतो, अवध किशोर नायक, खेमलाल साव, मुरारी नायक, रमजान मियां, डब्लू महतो, मोगली राम, केदार नायक, लखन सोनी सहित अनेक आंदोलनकारी उपस्थित थे।
सभी ने एक स्वर में कहा कि अधिकार, सम्मान और पहचान की लड़ाई अब तेज होगी, और सरकार को आंदोलनकारियों की मांगों को गंभीरता से लेना ही होगा।

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